पाठ्यक्रम: GS2/अंतरराष्ट्रीय संबंध
संदर्भ
- अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो अपने पहले आधिकारिक दौरे पर भारत पहुँचे।
परिचय
- अपने दौरे के प्रथम दो दिनों में उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री के साथ उच्च-स्तरीय वार्ताओं की श्रृंखला आयोजित की।
- वे नई दिल्ली में आयोजित होने वाली क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक में भाग लेने वाले हैं।
- उनका यह दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका और भारत के संबंधों को लेकर गंभीर संभावनाएँ व्यक्त की जा रही थीं।
- हालाँकि, अमेरिका ने यह स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच संबंधों को “पुनर्स्थापित” करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह पहले से ही एक सुदृढ़ साझेदारी है।
भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों का अवलोकन
- भारत की स्वतंत्रता के पश्चात से ही अमेरिका के साथ संबंध शीत युद्ध काल के अविश्वास और भारत के परमाणु कार्यक्रम को लेकर दूरी से गुज़रे हैं।
- हाल के वर्षों में संबंध सुदृढ़ हुए हैं और आर्थिक व राजनीतिक क्षेत्रों में सहयोग सुदृढ़ हुआ है।
- द्विपक्षीय व्यापार: नया लक्ष्य “मिशन 500” के अंतर्गत 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है।
- 2017-18 से 2022-23 के बीच दोनों देशों के बीच व्यापार में 72% की वृद्धि हुई है।
- अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जिसके बाद चीन का स्थान है।
- रक्षा और सुरक्षा: भारत और अमेरिका ने गहन सैन्य सहयोग हेतु तीन “मूलभूत समझौते” किए हैं—2016 में लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ़ एग्रीमेंट (LEMOA), 2018 में प्रथम 2+2 वार्ता के बाद संचार संगतता और सुरक्षा समझौता (COMCASA), और 2020 में बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन एग्रीमेंट (BECA)।
- 2016 में अमेरिका ने भारत को “प्रमुख रक्षा साझेदार” का दर्जा दिया।
- अंतरिक्ष: भारत द्वारा हस्ताक्षरित आर्टेमिस समझौते ने मानवता के हित में अंतरिक्ष अन्वेषण के भविष्य के लिए साझा दृष्टिकोण स्थापित किया।
- बहुपक्षीय सहयोग: भारत और अमेरिका संयुक्त राष्ट्र, G20, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन सहित विभिन्न बहुपक्षीय संगठनों में निकट सहयोग करते हैं।
- ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ मिलकर अमेरिका एवं भारत क्वाड के रूप में एक राजनयिक नेटवर्क का संचालन करते हैं, जिसका उद्देश्य मुक्त एवं खुले इंडो-पैसिफिक को बढ़ावा देना है।
- परमाणु सहयोग: 2005 में नागरिक परमाणु समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत भारत ने अपने नागरिक और सैन्य परमाणु प्रतिष्ठानों को अलग करने तथा नागरिक संसाधनों को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अधीन रखने पर सहमति दी।
- बदले में अमेरिका ने भारत के साथ पूर्ण नागरिक परमाणु सहयोग की दिशा में कार्य करने का वचन दिया।
- नई पहलें: हाल ही में GE-HAL समझौते के अंतर्गत भारत में जेट इंजन निर्माण और “क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी पहल (iCET)” जैसी नई योजनाएँ घोषित की गई हैं, जो दोनों देशों के संबंधों में क्रांतिकारी बदलाव लाने का उद्देश्य रखती हैं।
चिंताएँ
- व्यापार और आर्थिक विवाद: शुल्क और बाज़ार पहुँच को लेकर मतभेद, विशेषकर कृषि, डेयरी उत्पाद, चिकित्सा उपकरण एवं डिजिटल सेवाओं में।
- अमेरिका ने भारत की संरक्षणवादी नीतियों और उच्च आयात शुल्क की आलोचना की है।
- भारत की सामरिक स्वायत्तता और रूस संबंध: रूस के साथ भारत की दीर्घकालिक साझेदारी अमेरिका के लिए चिंता का विषय है।
- रूस से S-400 वायु रक्षा प्रणाली की खरीद ने अमेरिका के CAATSA (काउंटरिंग अमेरिका’स एडवर्सरीज़ थ्रू सैंक्शंस एक्ट) के अंतर्गत चिंताएँ उत्पन्न कीं।
- अमेरिका रूस के विरुद्ध अधिक सुदृढ़ दृष्टिकोण की अपेक्षा करता है, जबकि भारत सामरिक स्वायत्तता और बहु-संरेखण की नीति अपनाता है।
- वैश्विक भू-राजनीतिक मुद्दों पर भिन्नता: रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे संघर्षों पर भारत ने प्रायः संतुलित या तटस्थ दृष्टिकोण अपनाया है।
- पश्चिम एशिया नीतियों, ईरान प्रतिबंधों और ऊर्जा सुरक्षा पर भी मतभेद उभरते हैं।
- भारत सामरिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देता है, जबकि अमेरिका गठबंधन-आधारित संरेखण की अपेक्षा करता है।
- आव्रजन और वीज़ा प्रतिबंध: H-1B वीज़ा मानकों में सख़्ती भारतीय आईटी पेशेवरों को प्रभावित करती है।
- वीज़ा प्रक्रिया में देरी छात्रों, कामगारों और व्यवसायों पर प्रभाव डालती है।
- अमेरिकी आव्रजन नीतियों की अनिश्चितता भारतीय प्रवासी समुदाय और प्रौद्योगिकी क्षेत्र के लिए चिंता का कारण है।
- रक्षा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की सीमाएँ: उन्नत सैन्य तकनीकों के हस्तांतरण पर प्रतिबंध।
- भारत में दीर्घकालिक रक्षा आपूर्ति की विश्वसनीयता को लेकर चिंताएँ।
- पाकिस्तान और क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: यद्यपि अमेरिका-पाकिस्तान संबंध शीत युद्ध काल की तुलना में कमजोर हुए हैं, भारत अब भी पाकिस्तान को अमेरिकी सैन्य सहायता को लेकर सतर्क रहता है।
- अमेरिकी विदेश नीति की अनिश्चितता: व्यापार नीतियों में बदलाव, अंतर्राष्ट्रीय समझौतों से हटना और प्रतिबंधों से संबंधित दबाव भारत के लिए अनिश्चितता उत्पन्न करते हैं।
निष्कर्ष
- भारत-अमेरिका संबंधों में सुदृढ़ सामंजस्य और स्थायी मतभेद दोनों विद्यमान हैं।
- रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार और इंडो-पैसिफिक सहयोग में साझेदारी गहराई तक पहुँची है, परंतु चुनौतियाँ सामरिक प्राथमिकताओं, आर्थिक हितों एवं भू-राजनीतिक दृष्टिकोणों में अंतर से जुड़ी हुई हैं।
- इन मतभेदों का प्रभावी प्रबंधन सतत संवाद, संस्थागत सहयोग और सामरिक चिंताओं के प्रति परस्पर सम्मान के माध्यम से ही संभव है।
- यह दीर्घकालिक स्थिरता और द्विपक्षीय संबंधों की प्रगति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक होगा।
Source: TH
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संक्षिप्त समाचार 23-05-2026
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